शुष्कं काष्ठं तिष्ठति अग्रे

Mahakal नगरी उज्जैन पानी के नीचे


महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर नगरी उज्जैन (in M.P. मध्यप्रदेश, India) पानी के नीचे ।


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शुष्कं काष्ठं तिष्ठति अग्रे


शुष्कं काष्ठं तिष्ठति अग्रे [cacophonous words]

यानी [यानि; योनि नहीं]

नीरस तरुवर पुरत: भाति” [euphonious]


विक्रमादित्य के दरबार में महाकवि कालीदास को अधिक सम्मान मिलता था । जब विद्वानों ने पूछा महाराज यह भेद क्यों? तो महाराज ने सभी विद्वानों और कवियों की सभा बुलाई और भवन के सम्मुख द्वार पर एक सूखे पेड [पेड़] का विशाल तना डाल दिया और कहा कि सभी विद्वान और कवि आते हुए बतायेंगे कि यह क्या है ।

सभी इस सधारण [साधारण] से [सा] प्रश्न को सुन कर सोचने लगे कि यह कैसी परीक्षा है, सब सम्राट जानते हैं कि एक भारी सूखा काठ सामने पडा [पड़ा] है ।

एक प्रमुख कवि ने कहा कि शुष्कं काष्ठं तिष्ठति अग्रे यानी [यानि, not योनि] सूखा काठ आगे पडा [पड़ा] है । आते हुए सभी कवि-विद्वानों ने कुछ इसी तरह ही इसे बयान किया ।

जब महाकवि कालीदास की बारी आई तो वे तने के सामने कुछ देर तक खडे [खड़े] देखते रहे और बोले कि महाराज नीरस तरुवर पुरत: भाति” अर्थात् एक तरुओं में श्रेष्ठ तरु जो कभी शाखाओं से, हरे पत्तों से, कलियों से और कोकिल कुन्जन से भर्पूर था

आज नीरस हो कर सामने शोभायमान है ।

- Shiv Kumar's blog (Google source)

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